March 1, 2021

मेरा संघर्ष और india 2020 lockdown corona virus

दोस्तो आपका स्वागत है मेरे ब्लॉग mtoyhindi.com पर और आज मैं आपके सामने मेरे साल 2020 india lockdown corona virus में मेरे साथ हुए कुछ अनुभव प्रस्तुत कर रहा हूँ। तो जुड़े रहिये मेरे साथ और शुरू करते है हमारे सफर क।

january 2020 corona virus in india


दोस्तो मैं कोई नोकरी नही करता मैं जहां पर रहता हूं वहां पर जूते चप्पल बनाने का काम होता है।
मैं भी अपने घर मे लेडीज शू बनाने का काम करता हु।
मेरे पिताजी और मैं ये काम करते है मेरी पत्नी घर का काम करती है और मम्मी की तबियत ठीक नही रहती लेकिन उनसे जो होता है वो काम वो भी कर लेती है ।
मेरे दो भाई है एक बैंक में जॉब करता है दूसरा एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता है।
तो जनवरी में मैं मेरा काम कर रहा था और मेरा काम अच्छा चल रहा था।

फरवरी 2020 corona virus और मेरा संघर्ष


फरवरी महीने में थोड़ी मंदी हुई काम थोड़ा स्लो हो गया।
लेकिन इतना काम मिल जाता था कि घर का खर्चा आसानी से निकल जाता था।लेकिन फरवरी के अंत तक मुझे मेरे चाचा जी ने बताया कि चाइना में कोई बीमारी फैली है जिसके कारण जो इस बीमारी से ग्रस्त होता है उसकी एक हफ्ते के अंदर मौत हो जाती है।
और अब ये बीमारी दूसरे देशों में भी फैल रही है।
लेकिन मैंने इस बात पर गौर नही दिया और अपने काम मे ही लगा रहा।
मुझे न्यूज देखना ज्यादा पसंद नही है।

मार्च -अप्रेल 2020 lockdown in india और मेरा सब्जी बेचने का फैसला


मार्च महीने में मेरे पिताजी की गांव में जाने की टिकट थी मेरी नानी से मिलने के लिए मम्मी पापा को जाना था।
मार्च की शुरू5में हमारे मोहल्ले में सभी कोरोना वायरस के बारे में बाते करने लगे मुझे भी लगने लगा कि अब मुझे भी इसके बारे में जानना चाहिए कि ये कोरोना वायरस क्या है?
मैने tv को चालू किया तो देखा कि सभी न्यूज़ चैनलों पर बस कोरोना वायरस के बारे में ही न्यूज चल रही थी।
मैंने ये देख की अब ये वायरस दूसरे देशों में भी बहुत तेजी से फैलने लगा है।
मेरे पिताजी के गांव जाने का समय नजदीक आ रहा था।
एक दिन का lockdown भी लग गया।
मैंने सोचा कि बस एक दिन का ही लोकडाउन ही होगा।
मेरे पिताजी और माँ गांव चले गए।
वहां उनके पहुंचने के बाद एक और न्यूज आयी कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने covid-19 के चलते india march 2020 me 21 दिन ka lockdown लगा दिया।
मुझे लगा कि चलो 21 दिन का ही तो है 21 दिन तो ऐसे ही बीत जाएंगे।
मैं अब रोज टेलीविजन के सामने ही बैठा रहता और न्यूज देखता रहता
हमारा पूरा मोहल्ला भी इस लोकडाउन से डर रहा था।
क्योंकि बाहर जाने पर पुलिस के डंडे के वीडियो देख कर मन मे ये डर था कि कुछ लाने के लिए बाहर जाएंगे तो पुलिस के डंडे पड़ेंगे।
मैं किराये के घर में रहता हूँ और यहां हमारे मोहल्ले में किसी के घर पर टॉयलेट नही सभी को सार्वजनिक शौचालय का प्रयोग करना पड़ता है।
इस कारण न चाहते हुए भी बाहर जाना ही पड़ता है।
साथ मे सब्जी वगरह रोजाना की गगर की जरूरतों की वजह से भी घर से बाहर जाना पड़ता है।
कोरोना का डर इतना फैला था कि मुझे अपने बड़े भाई के घर जाने से भी डर लग रहा था अगर मुझे कोरोना हो गया होगा तो ये इंफेक्शन उनको न हो जाये।
बहुत डर का माहौल बन गया था।
हर कोई एक दूसरे को छूने से भी डरता था।
फिर जिसका डर हमे सता रहा था वो हो गया हमारे मोहल्ले में किसी को कोरोना covid-19 का इंफेक्शन सन्दिग्ध पाया गया और उसको और उसके परिवार को कहीं पर ले गए।
यहां तक कि उनके पड़ोसियों तक को ले गए और पूरी गली को सेनेटाइज किया गया।
अब तो बाहर जाने से और भी डर लगने लगा कि कहीं हमको covid-19 इंफेक्शन हो गया तो हमको भी पता नही कहाँ ले जाएंगे।
जिसको ये संक्रमण हो जाता है उसके परिवार वालो को उससे मिलने भी नही देते थे।
अगर वो बच गया तो अपने घर जा सकता था अगर मर गया तो उसके परिवार वालो को उसकी लाश भी नही मिलती थी।
फिर बस डर के माहौल में जीने के अलावा हम कर भी तो क्या सकते थे।
सभी न्यूज वाले इसको चाइना की साजिश बता रहे थे।
अब साजिश किसी की भी हो भुगतान तो आम जनता ही कर रही थी।
इसके बाद एक राहत का समाचार आया कि आम जरूरतों की चीजों जैसे किराना दुकान और सब्जी की दुकान खोल सकते है और इसके साथ कुछ corona covid-19 गाईडलाइंस भी आयी कि सुबह और शाम में किसी पर्टिकुलर टाइम पर ही जाना होगा नही तो वही पुलिस के डंडे पडेंगे।
घर मे पैसे भी खत्म हो रहे थे। मेरा भाई जो कि बैंक में काम करता है।
उसका बैंक का बन्द नही हुआ था इसलिए उसको रोज बैंक जाना पड़ता था।
लेकिन कई बार उसको बस नही मिलती थी तो उसको भी छुट्टी करनी पड़ती थी।
और छोटे भाई का ऑफिस India 2020 lockdown corona covid-19 की वजह से बन्द हो गया था।
इसलिए वो भी घर पर था।
अब घर के खर्च के बारे में सोचकर टेंशन होने लगा था।
लेकिन थोड़े बहुत पैसे पापा घर पर छोड़कर गए थे।
इसलिए गुजारा चल रहा था।
जैसे तैसे मार्च और अप्रेल का महीना बीत गया और कोई काम भी नही था।

मई 2020 me lockdown ka india me asar और मेरी सब्जी की दुकान का विचार


तो मैंने और मेरे ताऊ जी के लड़कों ने मिलकर सब्जी बेचने का सोचा क्योकि एक वही एक काम था जो हम कर सकते थे।
बस हम सोचते ही रहते थे लेकिन india me lockdown 2020 के चलते कई दिनों तक काम शुरू नही किया।
और साथ मे समाज का डर था कि लोग हंसेगे कहेंगे कि अरे ये तो सब्जी बेच रहा है।
इसलिए अप्रेल के अंत तक हमने सब्जी का काम शुरू ही नही किया।
मेरे बुआ के लड़के ने भी सब्जी बेचना शुरू कर दिया था।
उसने कहा कि समाज हँसेगा तो हसने दो वो कोई खाना नही देने आएगा।
वो तो हमको खुद ही काम करके लाना पड़ेगा।
उसके बाद हमने ये निश्चित कर लिया कि अब हम सब्जी बेचेंगे। इस तरह अप्रेल भी खत्म हो गया।

जून india 2020 lockdown में सब्जी की दुकान की शुरुआत


अब हमको ये सोचना था कि सब्जी लाये कहाँ से और सबसे पहले ये की सब्जी को तोलने के लिए कांटा कहाँ पर मिलेगा कोनसा कांटा लाये इलेक्ट्रॉनिक या फिर जो ट्रेडिशनल कांटा है वो लाये।
कुछ जगह पूछताछ करने पर पता चला कि इलेक्ट्रॉनिक कांटा बहुत महंगा है और जो ट्रेडिशनल कांटा है वो बस 1600 रुपये का है।
हम तीनों ने 15-15 सौ रु करके 4500रु इकट्ठा किया और चले नए बिजनेस की शुरुआत करने ।
मैने तो सोच लिया था कि अगर सब्जी का काम अच्छा चल गया तो मैं मेरा ट्रेडिशनल काम को छोड़ दूंगा।
लोकडाउन के बाद भी सब्जी ही बेचूंगा।
इसके बाद मेरे बड़े भाई यानी मेरे ताऊजी के लड़के ने कांटे का इंतजाम कर दिया।
अब सब्जियां कंहा से लाये फिर पता चला कि वाशी में सब्जियों की बड़ी मार्केट है वहां से लेकर आते है लेकिन वहां पर जाने का रास्ता नही मालूम था।
कुछ और पूछताछ करने के बाद पता चला कि मानखुर्द में भी सब्जियां मिलती है और हमारे यहां के लोग वहीं से सब्जियां लेकर आते है।
मेरे बड़े भाई ने स्कूटर निकाला और हम पूछते पूछते मानखुर्द में जहां सब्जियां मिलती थी वहां पहुंच गए और जो हमको सस्ती लगी वो सब्जियां खरीद ली।
हमने 200रू में टमाटर का एक कैरेट खरीदा जिसमे 20 किलो टमाटर थे।
16 किलो भिंडी ली जिसकी कीमत 350 रु थी।और भी कुछ सब्जियां ली।
साथ मे अदरक मिर्च करीपत्ता और धनिया भी खरीदा।
फिर हम घर पे आ गए ।
हम सुबह 4 बजे निकले थे और अब 5.30 बज चुके थे हम दोनों थोड़ी देर आराम करने के बाद नहाकर ये सोचने लगे कि सब्जी का ठेला लगाए कहाँ पर हमने हमारे पास में ही एक खाली जगह पर सब्जी का ठेला लगा लिया और अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों के घर पर ये बता दिया कि सब्जी हमसे ही खरीदना।
लेकिन मुझे लगभग दो घण्टे हो गए बैठे को लेकिन एक जन के अलावा कोई भी नही आया ।
अब मुझे डर लगने लगा कि अगर सब्जी बिकी नही तो खराब न हो जाये।
यब मेरे भाई ने कहा कि हम मेरी गली में सब्जी बेचंगे और हमने वहां पर सब्जी का ठेला लगाया।
वहां पर हमारी थोड़ी बहुत सब्जियां बिकी।
हमे भी पता था कि सब्जियां बेचने के लिए या किसी भी काम को सेट होने के लिए समय लगता है ।
कुछ दिन बीते लेकिन अच्छा रिस्पोंस नही आ रहा था काफी सब्जियां तो खराब होने के कारण फेंकनी पड़ती थी।
कुछ कम भाव मे निकालनी पड़ती थी।
फिर हमारे घर के पास एक लड़के ने चाइनीस भेल बेचनी शुरू कर दी उसका काम थोड़े ही दिनों में अच्छा हो गया हमने सोचा सब्जियों के साथ चाइनीस भजिया भी बेचते है।
मेरे भाइयो में से एक नए भजिया बनाया और दूसरे ने सेजवान चटनी बनाई और मैं चला भजिया बेचने।
आप यकीन नही करेंगे मैने लगभग 20 मिनट में 600 रु के भजिया बेच दिए।
लेकिन हमारे पास के एक अंकल ने मुझे कहा कि तुम इस बच्चे का काम क्यों कम कर रहे हो मैने कहा कि वो तो चाइनीस भेल बेचता है और मैं भजिया तो इसमें मैंने उसका धंधा कैसे खराब किया।
उन्होंने कहा कि तुम्हारे भजिया बेचने के कारण उससे कोई भेल नही खरीद रहा।
मेरा मन वहीं खराब हो गया फिर मैंने भजिया बेचना बन्द कर दिया।
मेरे भाइयो ने कहा कि तुम क्यों नही बेच रहे तो मैंने कहा कि बस मन नही कर रहा।
फिर हमने फिर से सब्जी पर फोकस किया।
हमने पूरा एक महीना दिया पर इससे घर का खर्च भी नही निकलता था।
क्योकि जो भी हमारी बचत होती थी।
उतनी तो हमारी सब्जियां न बिकने के कारण खराब हो जाती थी।
एक महीने बाद हमने सब्जियां बेचना बन्द करने का निश्चय किया।
हमने जो सब्जियां बची थी उसे कम भाव में बेच दिया और अपना अपना हिस्सा वापिस ले लिया।
अब जंहा पर थे हम वहीं वापिस आ गए।
मुझे अच्छा नही लग रहा था घर पर खाली बैठे फिर मेरे बड़े भाई ने बताया कि हमारे समाज के कई लोग नोकरी करने जा रहे है पर कहाँ ये पता नही।
जब हमने पता किया तो पता चला कि सभी दाना मंडी और सब्जी मंडी में जा रहे है वहां पर हमाल का काम करते है।
अब हमारे मन से ये डर निकल चुका था कि लोग क्या कहेंगे क्योकि सभी लोग अपने घर के खर्च के लिए कुछ न कुछ नीचा काम कर रहे थे।
तो हमने भी बहाव की तरफ जाने का फैसला किया।
मैं और मेरा ताऊजी का लड़का दोनों वाशी में गए और वहां पर दाना मंडी में काम ढूंढने लगे।
एक आदमी ने कहा कि चलो तुम्हारे लिए काम है तो हम चले गए।
वहां पर 200 गोनी चावल की पड़ी थी उसको उठाकर दूसरे हमाल के सर पर रखना था।
एक गोनी का वजन लगभग 30 किलो था और एक गोनी उठाने का 50 पैसा देने का तय हुआ वैसे वो काम तो एक आदमी का ही था लेकिन हम नए थे और कभी इतना बोझ उठाया भी तो नही था तो मैं मेरे भाई के लड़के को भी साथ ले गया था तो हम दोनों गए और मेरा भाई दूसरी जगह काम ढूंढने गया।
हम दोनों ने उसको 200 गोनी उठवा दी और पैसे के लिए कहा तो उसने कहा कि पैसे बाद में मिलेंगे मेरा भाई भी दूसरा काम ढूंढकर आ गया था।
वहां पर 350 गोनी उठावानी थी।
वहां पर हम तीनों को बहुत ही दिक्कत हुई क्योकि जहां हमने 200 गोनी उठवाई थी वहां पर एक ही आदमी उठाने वाला था और हम दो लोग थे इससे हमको थोड़ा समय मिल जाता जिससे हमारे हाथों को थोड़ा आराम मिल जाता लेकिन यहाँ पर 5 लोग उठाने वाले थे और हम तीन लोग अब हमने उठवाना शुरू किया लेकिन मेरे हाथ छिल गए क्योकि वो बहुत तेजी से आ रहे थे और हाथों को थोड़ा भी आराम नही मिल रहा था।
हमने जैसे तैसे करके अपना काम पूरा किया।
फिर कुछ समय तक हमको काम नही मिला और खाना खाने का समय भी हो गया हम अब खाने के लिए चले गए।
इतनी मेहनत के बाद खाना खाने का मजा ही कुछ और था।
अब फिर मेरा भाई कोई काम ढूंढने गया लेकिन कम नही मिला।
और हम वापिस आ गए हमारे पूरे दिन की कमाई बहुत कम थी और बदन भी दर्द करने लगा था।
मैने अगले दिन न जाने का फैसला किया लेकिन मेरा भाई और मेरा भतीजा गया था।
हम एक दो बार और गए लेकिन हमें पता चल चुका था कि ये काम हमारे लिए नही है और उसके बाद हम वहां नही गए।अब फिर से हम बेरोजगार हो चुके थे।

जुलाई 2020 corona virus के संकट का समय और हमारी काम की तलाश lockdown india


फिर मेरे बड़े भाई ने काम ढूंढना शुरू किया अबकी बार उसको किसी ने बताया कि किसी बिल्डिंग में मजदूरों की जरूरत है। India me Lockdown 2020 के चलते मजदूर अपने गांव चले गए थे।
हम वहां पर पता करने गए लेकिन वहां पर हमारे समाज के कई लोग पहले ही काम कर रहे थे।
अब ”लोग क्या कहेंगे” ये वाक्य का मेरे लिए कोई मायने ही नही था।
अब हम रोज काम की तलाश में भटकने लगे और एक दिन फिर से हमे काम मिल गया वही बिल्डिंग में मजदूर का काम करना था।
हम लगभग 8 लोग गए और एक हफ्ते तक काम किया लेकिन पैसे न मिलने के कारण वो काम भी हमे छोड़ना पड़ा।
अब हम हर तरह से हार चुके थे लेकिन फिर भी एक उम्मीद थी कि हमारा काम जल्दी ही शुरू हो जायेगा उसके बाद हम कई दुकानों पर गए लेकिन हमको काम नही मिला।
अब मेरे भाई ने बताया कि कुर्ला में एक किताबों की दुकान पर आदमी की जरूरत है में काम है।
तो मैं मेरा बड़ा भाई और मेरे भाई का लड़का तीनो गए।
वहां पर उन्होंने कहा कि क्या अपना आधार कार्ड का जेरोक्स लाये हो हमने अपने अपने आधार कार्ड की जेरोक्स और एक एक फोटो उनको दिया उन्होंने कहा कि हमारी दुकान में काम करना है तो हमारे हिसाब से चलना पड़ेगा हम 400 रु रोज के हिसाब से पैसे देते है।
लेकिन तुमको 25 दिनों तक काम करने के बाद ही पैसे मिलेंगे अगर 20 दिन किया और कहा कि अब हमको नही करना तो पैसा नही मिलेगा ये पहले ही सोच लो।
हम मान गए।
लेकिन मन मे डर था कि ऐसा क्या काम करवाने वाले है कि ऐसी कंडीशन रखी है।
कुछ देर बाद हमको पता चल गया कि क्या काम करना है।
बाहर एक ट्रक खड़ा था जिसमे कैरम बोर्ड के कार्टून थे जो उठाके हमे गोडाऊन में रखने थे।
पहले तो उनका साइज देखकर ही मैं डर गया कि इतने बड़े बॉक्स कैसे उठाऊंगा।
उनका वजन ज्यादा नही था लगभग 30 किलो के करीब होगा लेकिन साइज ज्यादा बड़ा था।
मैने वो उठाने से मना कर दिया और छोटे बॉक्स देने के लिए कहा हालांकि उन छोटे बॉक्स का वजन ज्यादा था लेकिन साइज छोटा था तो मैं उसको अपने कंधे पर उठा कर रखने लगा।
धीरे धीरे मैने कुछ बॉक्स गोडाऊन में रख दिये लेकिन छोटे बॉक्स खत्म हो चुके थे तो मैंने तर्क के ऊपर से बॉक्स को निकालने का काम शुरू कर दिया जिसमें एक और आदमी मेरी मदद कर रहा था।
फिर ट्रक खाली करने के बाद मैं फिर से सभी के साथ दुकान में चला वहां पर दुकान के मालिक ने सबके के लिए प्रोंठे और चाय मंगवाई।
सभी ने खाये लेकिन मैं बाहर का नही खाता क्योकि उसमे लहसुन और प्याज हो सकता है।
मैं लहसुन और प्याज नही खाता मैन अपना प्रोंठे मेरे भाई को दे दिए फिर सभी वापिस से काम पर लग गए।
फिर जो ग्राहक आते उनके लिए वो कैरम के बॉक्स गोडाऊन से लेकर आते।
ये एक होलसेल की दुकान थी तो ग्राहक भी पूरा बॉक्स ही खरीदते थे।
इसके बाद किताबो की दुकान से एक आदमी आया और उसने एक पर्ची मुझे और दो और लोगो को दूसरे गोडाऊन से किताबें लेने के लिए भेज दिया।
हम तीनों बाहर उनके टेम्पो में बैठे और चल पड़े गोडाऊन की और मैंने सोचा किताबें ही तो है कोई पहाड़ थोड़े ही है ले आएंगे।
फिर हम गोडाऊन में पहुंच गए। जब हम गोडाऊन के अंदर गए तो वहां का नजारा देखकर मैं दंग रह गया।
इतना बड़ा गोडाऊन और वहां पर रखी किताबें देखकर मेरा सिर चकरा गया।
लेकिन फिर याद आया कि ये एक होलसेल की दुकान है।
मैंने अपने आप को तैयार किया और चल पड़ा बोझा उठाने ।
उन किताबो के बंडल का वजन भी लगभग 30 से 40 किलो तक था वजन का मसला नही था मेरे साथ वो किताबें मेरे कंधे पर चुभ रही थी जिससे मेरे कंधे पर जख्म होंगये।
फिर भी मैंने15 से 20 बण्डल को उठाकर टेम्पो में डाला और एक आदमी उनको टेम्पो में सेट कर रहा था।
और एक आदमी मेरे साथ बण्डल उठा रहा था।उसने भी उतने ही बण्डल टेम्पो में डाले।
अब वापिस जाने की बारी थी वो दोनों वहीं रुक गए और मुझे उस टेम्पो वाले के साथ वापिस भेज दिया।
मुझे पता नही था कि वो वहां पर क्यो रुक गए।
जब मैं वहाँ पर पहुंचा तो वहाँ पर दुकान के मालिक को कहा कि किताबें आ गयी है उनको उतरवादें ।
उसने कहा तुम उतारो मैं किसी को भेजता हु।
लेकिन सभी बिजी थे।
उसने मेरे भाई और भतीजे मो भेज दिया।
मेरे कंधे जख्मी हो चुके थे और एक बण्डल भी उठाना भारी हो गया मैने मेरे भाई से कहा कि मुझसे ये काम नही हो सकेगा वो भी थक चुके थे।
उसने कहा मैं भी नहीं कर सकता और हम दोनो वहां से निकल गए।
लेकिन मेरा भतीजा वहीं रुक गया और वो पूरा दिन काम करता रहा और शाम को जब वो वापिस आया तो उसके भी कंधे छिले हुए थे और पूरा बदन दर्द कर रहा था।
लेकिन उसने कहा कि वो ये काम कर लेगा लेकिन मेरी भाभी ने उसको मना कर दिया।
अब जुलाई के महीना भी बीत गया।

अगस्त 2020 lockdown में सही जगह काम मिलना india


हम हर तरह से हार चुके थे लेकिन कोशिश जारी थी काम ढूंढने की ।
दो चार दिन बीत जाने के बाद मेरे भाई और भतीजे को काम मिल गया।
लेकिन मैं बेरोजगार ही रहा लेकिन उसने एक दुकान वाले से बात कर रखी थी।
और हम उसके पास गए लेकिन वो आज बन्द था।
हम थोड़ा सा आगे गए तो हमारी नजर एक दुकान पर पड़ी वहां पर उस दुकान के मालिक दुकान खोल रहे थे।
मेरे भाई ने उनसे पूछा कि क्या आपकी दुकान पर काम मिलेगा ।
उन्होंने कहा कि आदमी की जरूरत तो है पर आप 12 बजे के करीब आना मैं अपने लड़के से बात करता हूँ।
मैं और मेरा छोटा भतीजा उनकी दुकान में 12 बजे गए और उन्होंने हमको दुकान में काम करने के लिए कह दिया।
उन्होंने हम दोनों को 9-9 हजार रुपये महीने के हिसाब से रख दिया।
हम उस दुकान के मालिक को भाई कहते थे और उनके लड़के को भी भाई कहते थे।
वो बहुत अच्छी तरह से हमारा ख्याल रखते थे।
लेकिन काम की कमी होने की वजह से उन्होंने हेमन्त को कम छोड़ने को कह दिया।
लेकिन उन्होंने ये वादा किया था कि जैसे ही काम चलेगा वो फिर से हेमन्त को बुला लेंगे।
मैंने दो महीनों तक वहां पर काम किया लेकिन कभी ये महसूस नही हुआ कि मैं किसी की नोकरी कर रहा हूं हमेशा यही अनुभव हुआ कि मैं अपने घर पर ही हूँ।
मैने ये निश्चय कर लिया था कि अब मैं यंही पर ही काम करूंगा।
लेकिन मेरी किस्मत को ये मंजूर नही था।
एक दिन पिताजी ने कहा कि तुम रात को रोज लेट आते हो और अपना काम भी शुरू हो गया है।
इसलिए तुम वो जॉब छोड़ दो मैने उनको बहुत समझाया कि मैं यहीं काम करना चाहता हूं।लेकिन उन्होंने कहा कि अब बस छोड़ दो।
मैंने अगले दिन भाई को फोन किया और उनको बताया कि मैं ये जॉब छोड़ रहा हु।
लेकिन मैं अंदर से बहुत दुःखी था क्योंकि मैंने भी से वादा किया था कि जब तक उनके पुराने काम करने वाले नही आएंगे मैं उनकी दुकान को नही छोडूंगा।
मेरा वादा टूट गया और मैं भी।
इस कोरोना काल मे मैंने जो भाई की दुकान में जो दिन बिताये वो दिन मेरे जिंदगी के सुनहरे दिन थे।
भले ही मैं अपने काम मे कितने भी पैसे कमा लूं लेकिन वो 9000 रु मुझे वहां से मिले वो सुख मेरी अब की कमाई में नही है।
वहां पर मुझे बहुत कुछ सीखने को भी मिला दोस्त भी मिले एक विजय भाई दूसरे रणजीत भाई और तीसरा आदर्श ।
आदर्श से मैं कुछ ज्यादा ही घुल मिल गया हूँ वो अभी भी मुझसे जुड़ा हुआ है।
हम कभी कभी फोन पर बात कर लेते है।
बस इसके बाद मैं अपना काम करने लगा और सब कुछ नॉर्मल हो गया।
कहने को और भी बहुत कुछ है लेकिन आप पढ़ते पढ़ते बोर न हो जाये इसलिए यंही पर समाप्त कर रहा हूँ।
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